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ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं। इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं। सच घटे या बड़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं। ज़िन्दगी! अब बता कहाँ जाएँ ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं। जिसके कारण फ़साद होते हैं उसका कोई अता-पता ही नहीं। धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं। कैसे अवतार कैसे पैग़म्बर ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं। उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्या ख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं। जड़ दो चांदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं। अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है ‘नूर’ संसार से गया ही नहीं।

अगर दुखता नहीं दिल तो वो दिल नहीं

ब-ज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है मगर ये तो मिरी मंज़िल नहीं है ये तूदा रेत का है बीच दरिया ये बह जाएगा ये साहिल नहीं है बहुत आसान है पहचान उस की अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है मुसाफ़िर वो अजब है कारवाँ में कि जो हमराह है शामिल नहीं है बस इक मक़्तूल ही मक़्तूल कब है बस इक क़ातिल ही तो क़ातिल नहीं है कभी तो रात को तुम रात कह दो ये काम इतना भी अब मुश्किल नहीं है विज्ञापन जब आईना कोई देखो इक अजनबी देखो कहाँ पे लाई है तुम को ये ज़िंदगी देखो मोहब्बतों में कहाँ अपने वास्ते फ़ुर्सत जिसे भी चाहे वो चाहे मिरी ख़ुशी देखो जो हो सके तो ज़ियादा ही चाहना मुझ को कभी जो मेरी मोहब्बत में कुछ कमी देखो जो दूर जाए तो ग़म है जो पास आए तो दर्द न जाने क्या है वो कम्बख़्त आदमी देखो उजाला तो नहीं कह सकते इस को हम लेकिन ज़रा सी कम तो हुई है ये तीरगी देखो निगल गए सब की सब समुंदर ज़मीं बची अब कहीं नहीं है बचाते हम अपनी जान जिस में वो कश्ती भी अब कहीं नहीं है बहुत दिनों बा'द पाई फ़ुर्सत तो मैं ने ख़ुद को पलट के देखा मगर मैं पहचानता था जिस को वो आदमी अब कहीं नहीं है गुज़र ...

मोटिवेशन

जीवन में आपको जो चाहिए वो कभी नहीं मिलेगा..... बल्कि जो हर हाल में चाहिए वो जरूर मिलेगा...... अपने लक्ष्य के प्रति जिद्दी बनो। जिस दिन तुम्हें हर गली, हर मोहल्ला, हर इतवार, हर एन्जॉयमेंट में अपना सपना दिखने लगेगा न, उस दिन तुम्हें सफल बनने से कोई भी नही रोक सकता...!!